न्याय के मंदिर की गरिमा और नागरिक मर्यादा

न्याय के मंदिर की गरिमा और नागरिक मर्यादा

भारतीय लोकतंत्र की संपूर्ण संरचना चार प्रमुख स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और स्वतंत्र मीडिया—पर आधारित है। इनमें न्यायपालिका वह संस्था है, जिसके समक्ष प्रत्येक नागरिक अंतिम उम्मीद लेकर पहुँचता है। जब प्रशासनिक तंत्र विफल हो जाता है, जब शासन से निराशा हाथ लगती है और जब अधिकारों का हनन होता है, तब नागरिक न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाता है। इसलिए न्यायालय केवल एक संवैधानिक संस्था नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास का केंद्र भी है। ऐसे में यदि न्यायालय की कार्यवाही के दौरान अमर्यादित व्यवहार, आक्रोश, धमकी, अभद्र भाषा या अव्यवस्था का वातावरण बनता है, तो उसका प्रभाव केवल एक अदालत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र की संपूर्ण विश्वसनीयता पर पड़ता है।

 

हाल के दिनों में सर्वोच्च न्यायालय में घटी एक घटना ने पूरे देश का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि न्यायालय की गरिमा और नागरिक आचरण के बीच संतुलन बनाए रखना कितना आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति को न्याय पाने का अधिकार है, अपनी बात रखने का अधिकार है और न्यायिक निर्णयों की संवैधानिक सीमाओं के भीतर आलोचना करने का भी अधिकार है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अदालत की कार्यवाही बाधित की जाए, न्यायाधीशों के प्रति असम्मान प्रदर्शित किया जाए या न्यायालय को व्यक्तिगत आक्रोश व्यक्त करने का मंच बना दिया जाए। ऐसी घटनाएँ लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विरुद्ध हैं और न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास को प्रभावित करती हैं।

 

यह भी उतना ही सत्य है कि किसी नागरिक का ऐसा व्यवहार प्रायः एक दिन में उत्पन्न नहीं होता। कई बार वर्षों तक मुकदमेबाजी, आर्थिक बोझ, मानसिक तनाव, सामाजिक असुरक्षा और न्याय मिलने में अत्यधिक विलंब व्यक्ति को गहरी निराशा की स्थिति में पहुँचा देते हैं। इससे उसके भीतर व्यवस्था के प्रति असंतोष और आक्रोश जन्म ले सकता है। किंतु किसी भी परिस्थिति में यह आक्रोश अदालत की गरिमा भंग करने का औचित्य नहीं बन सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों के साथ कर्तव्य और मर्यादा भी समान रूप से आवश्यक हैं।

 

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है, क्योंकि विचारों की अभिव्यक्ति के बिना स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती। परंतु संविधान ने इस स्वतंत्रता को निरपेक्ष अधिकार नहीं माना है। सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, मानहानि और न्यायालय की अवमानना जैसे विषयों पर उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था भी की गई है। इसका उद्देश्य अभिव्यक्ति को दबाना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और समाज में संतुलन बनाए रखना है। न्यायालयों के निर्णयों की कानूनी आलोचना की जा सकती है, उन पर विद्वत्तापूर्ण विमर्श हो सकता है, पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान, अभद्र भाषा और न्यायिक प्रक्रिया में व्यवधान किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकते।

 

न्यायपालिका की सबसे बड़ी शक्ति उसके पास उपलब्ध पुलिस बल या दंडात्मक अधिकार नहीं, बल्कि जनता का विश्वास है। यही विश्वास न्यायालय के प्रत्येक आदेश को प्रभावी बनाता है। यदि न्यायालय की गरिमा बार-बार चुनौती का विषय बनने लगे और उसके प्रति सम्मान कम होने लगे, तो कानून के शासन की मूल अवधारणा कमजोर पड़ने लगेगी। इसलिए न्यायपालिका की संस्थागत प्रतिष्ठा की रक्षा केवल न्यायाधीशों या अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक दायित्व भी है।

 

दूसरी ओर यह भी स्वीकार करना होगा कि भारतीय न्याय व्यवस्था अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। देश की विभिन्न अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं। अनेक मामलों में निर्णय आने में वर्षों नहीं, बल्कि दशकों का समय लग जाता है। न्याय पाने की प्रक्रिया आम नागरिक के लिए आर्थिक और मानसिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत कठिन हो जाती है। मुकदमों की लंबी अवधि, बार-बार की तारीखें, बढ़ता हुआ खर्च और अनिश्चित परिणाम व्यक्ति को निराशा के गर्त में धकेल देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में न्यायिक सुधारों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस होती है।

 

न्यायिक सुधार केवल नए कानून बनाने तक सीमित नहीं होने चाहिए। न्यायालयों में रिक्त पदों की शीघ्र नियुक्ति, आधुनिक तकनीक का अधिकतम उपयोग, ई-कोर्ट प्रणाली का विस्तार, डिजिटल रिकॉर्ड, समयबद्ध सुनवाई और वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र को मजबूत बनाना समय की आवश्यकता है। यदि मुकदमों का शीघ्र निपटारा होगा, तो नागरिकों में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास और संतोष भी बढ़ेगा।

 

साथ ही यह भी आवश्यक है कि न्यायालय आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक मुकदमे के रूप में न देखा जाए। अनेक लोग वर्षों की सामाजिक, आर्थिक और मानसिक पीड़ा लेकर अदालत तक पहुँचते हैं। इसलिए जहाँ आवश्यक हो, वहाँ परामर्श सेवाओं और मनोसामाजिक सहायता की व्यवस्था भी विकसित की जानी चाहिए। इससे तनावग्रस्त पक्षकारों को भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायता मिल सकती है और अनावश्यक टकराव की संभावना भी कम होगी।

 

अदालतों की सुरक्षा व्यवस्था भी समय की मांग है। न्यायालयों में प्रतिदिन बड़ी संख्या में पक्षकार, अधिवक्ता और आम नागरिक आते हैं। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था केवल औपचारिक न रहकर प्रभावी और प्रशिक्षित होनी चाहिए, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से तत्काल और गरिमापूर्ण ढंग से निपटा जा सके। न्यायालय का वातावरण भयमुक्त, अनुशासित और सम्मानजनक होना प्रत्येक लोकतांत्रिक समाज की प्राथमिकता होनी चाहिए।

 

आज आवश्यकता इस बात की भी है कि समाज में न्यायिक साक्षरता को बढ़ावा दिया जाए। अधिकांश नागरिक अदालतों की प्रक्रिया, अधिकारों और दायित्वों से पूर्णतः परिचित नहीं होते। यदि विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से संवैधानिक मूल्यों तथा न्यायिक प्रक्रिया के बारे में जागरूकता बढ़ेगी, तो न्यायालयों के प्रति सम्मान और समझ दोनों विकसित होंगे।

 

लोकतंत्र में आलोचना का महत्वपूर्ण स्थान है। न्यायपालिका भी आलोचना से परे नहीं है। अनेक ऐतिहासिक निर्णयों पर समय-समय पर विद्वानों, अधिवक्ताओं और नागरिक समाज ने गंभीर विमर्श किया है। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान भी है। किंतु आलोचना तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक मर्यादाओं पर आधारित होनी चाहिए। व्यक्तिगत कटाक्ष, अभद्र व्यवहार और संस्थाओं का सार्वजनिक अपमान लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करते हैं।

 

यह भी स्मरण रखना होगा कि न्यायालय केवल न्यायाधीशों का नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का संस्थान है। इसकी गरिमा की रक्षा करना उतना ही आवश्यक है जितना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना। दोनों में कोई विरोध नहीं है। वास्तविक लोकतंत्र वही है जहाँ नागरिक निर्भीक होकर अपनी बात कह सके और साथ ही संस्थाओं के सम्मान की मर्यादा भी बनाए रखे।

 

आज जब सामाजिक संवाद का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों पर स्थानांतरित हो चुका है, तब न्यायिक संस्थाओं के संबंध में अपुष्ट सूचनाएँ, भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ और अपमानजनक टिप्पणियाँ तेजी से फैलती हैं। इससे न्यायपालिका की छवि प्रभावित होने के साथ-साथ समाज में भ्रम भी उत्पन्न होता है। इसलिए नागरिकों, मीडिया और सामाजिक मंचों की भी जिम्मेदारी है कि न्यायिक विषयों पर तथ्यपरक, संतुलित और जिम्मेदार संवाद को बढ़ावा दें।

 

भारतीय न्यायपालिका ने अनेक अवसरों पर यह सिद्ध किया है कि वह केवल कानून की व्याख्या करने वाली संस्था नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की संरक्षक भी है। न्यायिक संयम, निष्पक्षता और मानवीय दृष्टिकोण उसकी सबसे बड़ी विशेषताएँ हैं। उसी प्रकार नागरिकों से भी अपेक्षा है कि वे न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करें, धैर्य बनाए रखें और असहमति व्यक्त करते समय लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करें।

 

न्याय की प्रतिष्ठा केवल न्यायालय के आदेशों से नहीं, बल्कि समाज के सामूहिक आचरण से भी निर्मित होती है। यदि नागरिक अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समान महत्व देंगे, यदि न्यायपालिका समयबद्ध और सुलभ न्याय की दिशा में निरंतर आगे बढ़ेगी तथा यदि शासन आवश्यक न्यायिक सुधारों को प्राथमिकता देगा, तो लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा।

 

न्यायालय वास्तव में न्याय का मंदिर तभी बना रह सकता है जब उसके भीतर कानून की आवाज़ सबसे ऊँची हो, क्रोध की नहीं; तर्क का सम्मान हो, शोर का नहीं; और संविधान सर्वोच्च रहे, किसी व्यक्ति की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं। यही भारतीय लोकतंत्र की शक्ति है, यही उसकी गरिमा है और यही भवि

ष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

Amit Kumar Singh
Author: Amit Kumar Singh